Emergency in India in Hindi | आपातकाल 25 June 1975

Emergency in India indira gandhi

बात है 1975 की, आज से 47 साल बाद पहले की जब 21 महीनों के लिए डेमोक्रेसी के हाथ पैर तोड़ कर उसे अपाहिज बनाकर खुदगर्जी की काल कोठरी में सड़ने, गलने ओर मरने के लिए फेंक दिया गया था। पर 1975 से पहले आइए 15 अगस्त 1947 के काल से आती हुई एक आवाज सुनते हैं।

यह आवाज है हमारे पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू की “आधी रात के समय जब दुनिया सो रही होगी भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए उठेगा।”

28 साल के बाद आधी रात को ही जब दुनिया सो रही थी तब पंडित नेहरू की बेटी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की स्वतंत्रता का गला घोट दिया।

25 जून 1975 को रात 12:00 बजे से कुछ मिनट पहले ही भारत में आपातकाल लगा। इमरजेंसी और अगली सुबह इंदिरा गांधी ने और इण्डिया रेडियो पर देश को बता दिया कि आपातकाल लग चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो अब इस देश में वही होगा जो इंदिरा चाहेंगी ना संसद का कोई मूल्य रह गया न ज्यूडिशियरी का, अब इंडिया की स्पेलिंग INDIA नहीं INDIRA होगा।

 Emergency in India Indira Gandhi

इंदिरागांधी का ये दमनकारी फैसला भारतवर्ष की नसों में आग बनके दौड़ने लगा। उनके खिलाफ पूरा विपक्ष जनता मीडिया और बड़े बड़े कवि शायर अपनी आवाज़ बुलंद करने लगे। उन दिनों देश की गलियां और दीवारें इंदिरा विरोधी पोस्टरों से रंगी हुई थी और जन जन की जुबान पर राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां चढ़ी हुई थी।

“सदियों की ठंढी बुझी राख सुगबुगाहट उठी। मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है। दो राह। समय के रथ का कारगर नाद सुनो सिंहासन खाली करो कि जनता आती ही गई।”

जन कवि बाबा नागार्जुन जनता के बीच इंदिरा गांधी से पूछ रहे थे। “इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको सत्ता की मस्ती में भूल गई बाप को, क्या हुआ आपको।” ओर नौजवान कवि दुष्यंत कुमार की लेखनी पीड़ा से कराह रही थी

“हो गई है पीर पर्बत सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।”

करोड़ों आवाजों में हिन्दुस्तान इन्दिरा गांधी से पूछ रहा था कि आधी रात को आखिर आपातकाल की जरूरत क्या थी।

क्या हुआ था कैसे हुआ था क्यों हुआ था अब 25 जून की पूरी कहानी सुनिए और समझिए।

क्या हुआ था 25 जून 1975 को

इन्दिरा गांधी के साथ ये कौन पहचान रहे हैं। ये उस वक्त यानि 1975 में बंगाल के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। इनका नाम था सिद्धार्थ शंकर। ये इमरजेंसी वाला आईडिया इनका ही था। हुआ ये था कि 25 जून की सुबह इंदिरा गांधी ने सिद्धार्थ शंकर रे को अपने घर बुलाया और उनसे सलाह मांगी कि सत्ता विरोधी लहर को कुचला कैसे जाए रे साहब संविधान के जानकार भी थे और इंदिरा गांधी के वफादार भी थे।

देश में तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण की आँधी आई हुई थी। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में दुर्गा बनीं इंदिरा गांधी, 1975 में सूखे पत्ते की तरह थर्रा रही थी।

इंदिरा गांधी के खिलाफ जबरदस्त माहौल बन चुका था। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था। सिद्धार्थ शंकर रे ने पहले कहा, “मुझे सोचने का वक्त दीजिए।” और कुछ ही घंटे बाद सिद्धार्थ शंकर सोच विचार कर इंदिरा गांधी के पास आए और इमरजेंसी का आइडिया सुना दिया। इंदिरा गांधी को ये आइडिया पसंद आ गया।

फिर क्या था ना कैबिनेट को बताया ना मंत्रियों से सलाह ली और दो नेता राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास जा पहुंचे। इंदिरा गांधी ने फखरुद्दीन अली अहमद से कहा, देश संकट में है। आपातकाल लगाई।

राष्ट्रपति महोदय ने कहा “ठीक है लगा देते हैं कागज भिजवा दीजिए।”

इंदिरा गांधी घर लौटी और रातों रात दूत को कागज लेकर वापस उपराष्ट्रपति भवन रवाना कर दिया।

रात 12:00 बजे से पहले ही राष्ट्रपति के दस्तखत हो चुके थे और इस तरह आधी रात को भारत में इमरजेंसी लग गई

इमरजेंसी लगते ही इंदिरा गांधी अलग किरदार में कैरेक्टर बदल गया उनका । अपने विरोध में उठने वाली हर आवाज का गला घोंटने दिया। विपक्ष के बड़े बड़े नेता जेल में ठूंस दिए। अखबारों के दफ्तरों की बिजली काट दी। हर तरफ था इंदिरा गांधी का दम भूख और खौफ में था लोकतंत्र का एक एक स्तम्भ

आपातकाल के बाद प्रशासन के दमन और पुलिस की बर्बरता की वारदातें बढ़ती गई। प्रेस पर सेंशरशिप लगा दी गई। अखबारों के दफ्तर में बड़े बड़े अधिकारी तैनात कर दी गई। इंदिरा की इजाजत के बिना कुछ भी छापना अपराध बन चुका था।

गृह मंत्रालय के मुताबिक मई 1976 में करीब 7000 पत्रकार और मीडिया कर्मियों को गिरफ्तार किया गया था।

बाद राजनैतिक विरोधियों और प्रेसया मीडिया तक बैठी तब भी ठीक था। कला और कलाकार भी इंदिरा जी की तानाशाही से बच नहीं पाए।

किशोर कुमार के गाने रेडियो पर बैन कर दिए गए क्योंकि उन्होंने सरकार का साथ देने से इनकार कर दिया था।

इन्दिरा गांधी के इस फैसले से सबसे बड़े लोकतंत्र के सम्मान को गहरा धक्का लगा, जैसे भारत रातो रात एक लोकतांत्रिक देश बचा ही नहीं था। इसी दौरान सरकार की ओर से चलाया गया नसबंदी कार्यक्रम आपातकाल के अपराध का सबसे काला अध्याय बन गया। लेकिन इसकी कीमत इंदिरा गांधी को जल्द चुकानी पड़ी।

“कातिल ने किस सफाई से धोई है राज तीन उसको खबर नहीं। क्या लहू बोलता भी है”

1977 में आम चुनाव हुए, तीन दिन में कराए गए चुनाव में इंदिरा गांधी पूरी तरह पराजित हुई। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में विपक्ष एक जुट होकर लड़ा और जीता।

खुद इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार चुकी थी। चुनाव में कॉंग्रेस गठबंधन को सिर्फ 153 सीटें मिली थी और विपक्ष ने 298 सीटें जीती थी। और इस तरह देश में पहली बार गैर कॉंग्रेस सरकार बनी

ये तो था कि आपातकाल कैसे लगा और उसके बाद क्या हुआ

आपातकाल क्यों लगा।

आपातकाल इसलिए लगा क्योंकि उस समय इंदिरा गांधी को अपनी कुर्सी बचाने के लिए यही एक विकल्प दिखा था। 1971 में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी राज नारायण से करीब 1 लाख मतों के अंतर से जीत गई थी। परिणाम आने पर इंदिरा गांधी पर धांधली से चुनाव जीतने का आरोप लगा। राज नारायण ने उनके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक आरोप पत्र दाखिल किया।

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया। इंदिरा गांधी दोषी साबित हुई

और इसके बाद 1971 का चुनाव परिणाम निरस्त कर दिया गया और रद कर दिया गया। उनके चुनाव लड़ने पर भी छह साल तक पाबंदी लगा दी गई। इंदिरा गांधी हार गई थी और वह अब किसी भी संवैधानिक पद पर नहीं रह सकती थीं।

हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए 20 दिन का स्टे लगा दिया और कहा “इन 20 दिनों में कांग्रेस पार्टी अपने नेता का चुनाव कर सकती है। नए नेता का।”

लेकिन इंदिरा गांधी ने ये फैसला नहीं माना और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 13वें दिन इमरजंसी लगाकर लोकतंत्र की तरक्की कर दी। ये वही इंदिरा गांधी थी जिन्होंने 1971 के युद्ध जीत कर भी पाकिस्तान से अपने हिस्से का कश्मीर वापस नहीं मांगा था। इतना बड़ा दिल था इंदिरा का इतनी उदार थी हो, लेकिन परायों के साथ उदारता और अपनों के साथ इमरजेंसी। ये भी कोई बात हुई।

इमरजेंसी भारत के इतिहास की एक बहुत बड़ी भूल थी और इतिहास की पूरे भूले के लिए नहीं होती। सबक लेने के लिए होती है। हम भूल उसे सबक लेंगे, तभी नया भारत बनाएंगे। एक ऐसा भारत। यहां इमरजेंसी नहीं लगाई जाएगी।

एक ऐसा भारत जहां दुश्मनों को जीती हुई जमीनें और हारे हुए सैनिक लौटाए नहीं जाएंगे। जहां देश का बंटवारा नहीं होगा, जहां आक्रमण करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। यहां अपना हक किसी और को खैरात नहीं दिया जाएगा। जहां भारत मां के सीने पर लाल झंडे गाड़ने वालों के हाथ काट कर फेंक दिए जाएंगे। एक ऐसा भारत जो खुशहाल होगा बेमिसाल होगा एक ऐसा भारत जो आजाद होगा आबाद होगा और जिंदा बाद होगा।